अटल बिहारी वाजपेयी: नेहरू के कहने पर संसद में चीन से जुड़े सवाल को क्यों टाला?

भारत रत्न और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का नाम न केवल उनकी राजनैतिक उपलब्धियों के लिए याद किया जाता है, बल्कि संसदीय मर्यादा, संवाद क्षमता और विचारों की स्पष्टता के लिए भी हमेशा सम्मानित रहा है। उनकी जन्मतिथि यानी 25 दिसंबर को आज भी देश में “सुशासन दिवस” के रूप में मनाया जाता है, ताकि उनकी प्रशासकीय सोच और नेतृत्व गुणों को याद किया जा सके। Wikipedia

वाजपेयी जी संसद में विपक्ष के मुखर और तीखे आलोचक माने जाते थे। उनके कटाक्ष और शब्दों की धार पर संसद में सरकार अक्सर जवाब देती थी। खासकर चीन से जुड़े सवालों और कश्मीर जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर कड़े प्रश्न उठाने में उन्हें कोई हिचक नहीं थी।

लेकिन एक दिलचस्प प्रसंग भी सामने आया है। बात 1960 के दशक की है, जब चीन तथा भारत के बीच सीमा तनाव थी। उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे और उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी से अनुरोध किया कि वह संसद में चीन से संबंधित एक विशेष सवाल को आगे न बढ़ाएँ। अटल जी ने नेहरू के इस अनुरोध को तुरंत मान लिया।

यह निर्णय उस समय संसद और राजनैतिक माहौल की परिपक्वता और राजनीतिक समझदारी का उदाहरण माना जाता है। विपक्ष और सरकार — दोनों पक्षों के बीच गहरी विचारशीलता, सम्मान और संवाद की भावना वाजपेयी में स्पष्ट रूप से दिखती थी।

यह वही वाजपेयी थे जो अपने जीवन में आक्रामक सवाल उठाने वालों में गिने जाते थे, मगर निजी तौर पर नेहरू जैसे नेताओं के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध भी रखते थे। यह उनके व्यापक राजनैतिक दृष्टिकोण और इंसानियत को दर्शाता है — राजनीति केवल विरोध नहीं, समझ और संतुलन भी है

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