तीन मूर्ति भवन (Teen Murti Bhavan) दिल्ली के इतिहास में सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और संवेदनात्मक प्रतीक रहा है। स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने करीब 16 साल तक यहीं निवास किया था, इसलिए इस स्थान का राष्ट्रीय महत्व बेहद गहरा है।
इंदिरा गांधी ने जब 1966 में प्रधानमंत्री पद संभाला, तब उन्होंने इस ऐतिहासिक भवन को स्थायी रूप से प्रधानमंत्री आवास (PM House) के रूप में रखने की तीव्र इच्छा जताई। उनके लिए यह सिर्फ एक दफ्तर या मकान नहीं था — बल्कि यह उनके पिता की राजनीतिक विरासत और यादें का pots (संरक्षणमूलक केंद्र) जैसा था।
इंदिरा गांधी ने इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए अपने राजनीतिक विरोधी और वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी से अनुरोध किया कि वे इस विचार को औपचारिक रूप में एक पत्र के रूप में तैयार करें, ताकि इसे कैबिनेट में मंजूरी के लिए पेश किया जा सके।
लेकिन अटलजी ने यह पत्र लिखने से इनकार कर दिया और उन्हें याद दिलाया कि प्रधान मंत्री के रूप में यह निर्णय वे स्वयं ले सकती हैं। उनके इस व्यवहार से स्पष्ट था कि उन्होंने राजनीतिक भावना से ऊपर उठकर संविधान और कार्यालय की मर्यादा को महत्व दिया।
इसी वजह से, इंदिरा गांधी ने तीन मूर्ति भवन को पीएम हाउस बनाने का विचार पीछे खींच लिया। बाद में यह स्थान नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एवं लाइब्रेरी (NMML) का हिस्सा बन गया, और बाद में इसे सभी प्रधानमंत्रियों के योगदान को समर्पित प्रधानमंत्रियों का म्यूज़ियम और लाइब्रेरी घोषित किया गया।
इस फैसले पर कांग्रेस ने केंद्र सरकार के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया भी जताई, जिसमें दावा किया गया कि नेहरू की महान विरासत और योगदान को कमतर दिखाया जा रहा है।